2026 में जंतर मंतर पर क्या हुआ था? पूरी टाइमलाइन
6 जून से 25 जुलाई 2026 के बीच, दिल्ली के जंतर मंतर पर हजारों लोगों ने NEET-UG पेपर लीक को लेकर प्रदर्शन किया और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की। सोनम वांगचुक ने 26 दिन अनशन किया, 20 जुलाई के मार्च पर लाठीचार्ज हुआ, और 25 जुलाई को प्रधान ने इस्तीफा दे दिया, जिससे मुख्य प्रोटेस्ट खत्म हुआ।
जंतर मंतर दशकों से दिल्ली का तय प्रोटेस्ट स्थल रहा है, लेकिन 2026 की गर्मियों में यहां चले सात हफ्तों ने इसे एक राष्ट्रीय कहानी का केंद्र बना दिया — एक भूख हड़ताल, पुलिस की सख्ती, और आखिर में एक मंत्री का इस्तीफा, जिसकी जड़ें एक एग्जाम पेपर लीक और उससे कुछ हफ्ते पहले सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी तक जाती हैं। नीचे उन सात हफ्तों की तारीखवार पूरी कहानी है — कब क्या हुआ, कौन-कौन मैदान में उतरा, और आखिर में क्या बदला।
शुरुआत: एक अपमानजनक टिप्पणी, फिर एक पेपर लीक
जंतर मंतर तक पहुंचने वाली घटनाओं की कड़ी यहीं से शुरू नहीं हुई थी। 15 मई 2026 को, भारत के चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने फर्जी लॉ डिग्री से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए सक्रियता दिखाने वाले और सोशल मीडिया पर मुखर युवाओं को “कॉकरोच और समाज के परजीवी” कहा था। बाद में उन्होंने सफाई दी कि उनका मतलब सिर्फ फर्जी डिग्री रखने वालों से था, लेकिन यह सफाई उतनी दूर तक नहीं पहुंची जितनी दूर तक वह अपमानजनक टिप्पणी पहुंची थी। ठीक अगले दिन, 16 मई 2026 को, अभिजीत दीपके — औरंगाबाद, महाराष्ट्र के 24 वर्षीय कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट, जिनके पास बोस्टन यूनिवर्सिटी से मास्टर्स डिग्री है — ने कॉकरोच जनता पार्टी रजिस्टर की और इसी अपमानजनक शब्द को आंदोलन का नाम बना दिया। दो हफ्तों के भीतर ही CJP के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स सत्ताधारी पार्टी से आगे निकल गए — यह ग्रोथ ठीक उसी समय हुई जब एक अलग मुद्दा पक रहा था: NEET-UG मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम का पेपर कथित तौर पर लीक हो गया था, और इस पर गुस्सा अपना मंच तलाश रहा था।
6 जून 2026: पहला प्रोटेस्ट
इस आंदोलन से जुड़ा पहला सड़क प्रोटेस्ट 6 जून 2026 को जंतर मंतर पर हुआ, जो सीधे तौर पर NEET-UG पेपर लीक के आरोपों से भड़का था। शुरुआत से ही प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा थी, क्योंकि उनका मंत्रालय ही इस परीक्षा की देखरेख करता है। जो एक अकेले प्रदर्शन के रूप में शुरू हुआ था, वह अगले सात हफ्तों में जंतर मंतर पर एक लगातार चलने वाले जमावड़े में बदल गया, जिसमें छात्रों और एक्टिविस्ट्स के अलावा — जैसे-जैसे हफ्ते बीतते गए — ऐसे सार्वजनिक चेहरे भी जुड़ते गए जिनका NEET मुद्दे से सीधा कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन कहानी इतनी बड़ी हो चुकी थी कि उन्हें भी अपना रुख साफ करना पड़ा।
28 जून 2026: वांगचुक की भूख हड़ताल शुरू
इस प्रोटेस्ट का सबसे बड़ा सविनय अवज्ञा वाला कदम 28 जून 2026 को उठा, जब सोनम वांगचुक — लद्दाखी इंजीनियर और जलवायु कार्यकर्ता, जो अपनी पहले की लद्दाख एक्टिविज्म के लिए जाने जाते हैं — ने जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। वांगचुक का न तो CJP से कोई संगठनात्मक जुड़ाव था, न सीधे तौर पर NEET-UG मुद्दे से — छात्रों के समर्थन में उनका अनशन ही वह मोड़ था जिसने एक स्थानीय एग्जाम-लीक शिकायत को राष्ट्रीय कहानी में बदल दिया, क्योंकि उनका नाम पहले से मौजूद छात्र संगठनों से कहीं ज़्यादा पहचाना जाता था। उनके साथ ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के छह सदस्य भी शामिल हुए, जिनमें संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा भी थीं। इस पूरी अवधि में, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की संयुक्त सचिव ऐशे घोष और SFI अध्यक्ष आदर्श एम. साजी ने ज़मीन पर छात्र संगठनों को साथ लाने और प्रोटेस्ट को व्यवस्थित रखने में मदद की — यही संगठनात्मक रीढ़ थी जिसने वांगचुक के अनशन के इर्द-गिर्द बढ़ते ध्यान के बीच रोज़ाना प्रोटेस्ट को चलता रखा।
18 जुलाई 2026: अस्पताल में भर्ती, जवाबी अनशन, और नीली स्याही
अनशन के 20वें दिन, 18 जुलाई 2026 को, वांगचुक को जबरन अस्पताल में भर्ती कराया गया — लेकिन उन्होंने अनशन खत्म करने की बजाय अस्पताल के बिस्तर से ही इसे जारी रखा। उसी दिन अभिजीत दीपके ने भी एकजुटता में जंतर मंतर पर अपना अनशन शुरू किया, और प्रोटेस्ट के दौरान उन पर नीली स्याही फेंकी गई। एक ही दिन इन दोनों घटनाओं का साथ होना वह क्षण था जब सरकार पर दबाव अपने चरम पर पहुंच गया।
20 जुलाई 2026: “चलो संसद” मार्च और लाठीचार्ज
दो दिन बाद, 20 जुलाई 2026 को, प्रदर्शनकारियों ने “चलो संसद” मार्च की कोशिश की। पुलिस ने इसका सामना लाठीचार्ज और आंसू गैस से किया, जिससे अब तक काफी हद तक शांतिपूर्ण और स्थिर रहा प्रोटेस्ट अचानक टकराव भरा नज़र आने लगा और जंतर मंतर की तरफ देश-विदेश दोनों जगह ध्यान और बढ़ गया। वांगचुक के अस्पताल भर्ती होने और दीपके के अपने अनशन के ठीक बाद हुआ यह लाठीचार्ज दबाव को कम करने की बजाय और बढ़ा गया — हर नई घटना के साथ यह कहानी और ज़्यादा लोगों तक पहुंचती गई, सिमटी नहीं।
वांगचुक की सेहत पर असर, और नतीजा
अनशन खत्म होने तक वांगचुक कुल 26 दिन तक भूखे रहे — 28 जून से गिनते हुए — और उनका वज़न 9.1 किलोग्राम कम हो गया। अपने चिर-परिचित अंदाज़ में उन्होंने खुद को “ऑनरेरी कॉकरोच” कहा — यानी उस आंदोलन से खुद को जोड़ लिया जिसका नाम ही उस अपमानजनक टिप्पणी से निकला था जिसने परोक्ष रूप से यह पूरी कड़ी शुरू की थी।
दबाव रंग लाया। 25 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। इस इस्तीफे ने मुख्य प्रोटेस्ट को प्रभावी रूप से खत्म कर दिया, जिसे अब 6 जून से 25 जुलाई 2026 तक — यानी पहले प्रदर्शन से लेकर मांग पूरी होने तक सात हफ्तों की अवधि — के रूप में दर्ज किया जाता है।
26 जुलाई 2026: कहानी अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंची
प्रधान के इस्तीफे के अगले ही दिन, लंदन के ट्रफलगर स्क्वायर में एक एकजुटता रैली हुई, जिसमें जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने भाषण दिया — यह इस बात का सबूत था कि यह कहानी खत्म होते-होते दिल्ली से कितनी दूर तक फैल चुकी थी।
और कौन-कौन साथ आया
जंतर मंतर पर सिर्फ आयोजकों और अनशनकारियों से आगे भी काफी सार्वजनिक समर्थन जुटा। एक्टिविस्ट-वकील प्रशांत भूषण और RTI एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज ने खुलकर इन मांगों का समर्थन किया, और वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे ने भी अपना समर्थन जताया — यह खास तौर पर उल्लेखनीय है क्योंकि उनके अपने अनशनों ने ही दिल्ली के पहले के बड़े भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन को आकार दिया था। अभिनेता प्रकाश राज दिल्ली के प्रोटेस्ट और बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में हुए समानांतर जमावड़े, दोनों में शामिल हुए, जबकि अभिनेता अतुल कुलकर्णी ने युवाओं से खुलकर जुड़ने की अपील की। नसीरुद्दीन शाह, रत्ना पाठक शाह और सोनाक्षी सिन्हा ने भी सार्वजनिक रूप से समर्थन दिया, और मलयालम फिल्म जगत के ममूटी और तोविनो थॉमस ने छात्रों का साथ दिया। रैपर हनुमानकाइंड और KRSNA भी प्रोटेस्ट स्थलों पर मौजूद हिप-हॉप दल का हिस्सा थे। कई विपक्षी नेताओं ने भी सार्वजनिक मंचों से इन मांगों का समर्थन किया, हालांकि यह जंतर मंतर पर खुद पहुंचने की तुलना में काफी कमज़ोर तरह का समर्थन है — ज़्यादातर नेता व्यक्तिगत रूप से मौके पर नहीं पहुंचे।
टाइमलाइन इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ी
किसी प्रोटेस्ट के दबाव में एक मंत्री का इस्तीफा होना, वह भी सिर्फ सात हफ्तों में, आमतौर पर बहुत कम समय माना जाता है — लेकिन जब सारे टुकड़े साथ रखकर देखें तो यह रफ्तार समझ में आती है। जंतर मंतर के पहले प्रदर्शन से ठीक पहले के हफ्तों में ही CJP का इंस्टाग्राम फॉलोइंग सत्ताधारी पार्टी से आगे निकल चुका था — यानी प्रोटेस्ट स्थल की खबरें पारंपरिक मीडिया कवरेज पर निर्भर हुए बिना भी तेज़ी से और दूर तक फैल सकती थीं। इसके बाद वांगचुक के अनशन ने एक दूसरी परत जोड़ी: एक जाना-पहचाना सार्वजनिक चेहरा, जिसकी सेहत कैमरों के सामने साफ-साफ बिगड़ती जा रही थी — यह छात्रों की भीड़ से बिल्कुल अलग तरह का दबाव होता है। और 20 जुलाई का लाठीचार्ज एक तीसरी परत लेकर आया — टकराव का एक साफ नज़र आने वाला पल, जिसने सार्वजनिक हस्तियों, विपक्षी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के लिए चुप रहना और मुश्किल बना दिया। ये तीनों एक-दूसरे को बढ़ावा देते रहे, और मिलकर सात हफ्तों में उतना दबाव बना गए जितना शायद इनमें से कोई एक अकेले नहीं बना पाता।
प्रोटेस्ट ने क्या नहीं बदला
यहां एक बात साफ कर देना ज़रूरी है। CJP, वह आंदोलन जिसकी स्थापना इस पूरी कहानी से जुड़ी है, अब भी भारतीय चुनाव आयोग के पास अपंजीकृत है और किसी भी चुनाव में कोई उम्मीदवार नहीं उतारता — यह प्रोटेस्ट एक खास मंत्री के इस्तीफे और एग्जाम सिस्टम की शिकायत को लेकर था, न कि किसी चुनावी अभियान का हिस्सा। जंतर मंतर के इन प्रदर्शनों से इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।
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